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चुदाई की कहानी

प्रेषिका : राबिया पिछले महीने 19 जनवरी की रात जीजी की शादी हुई और इसी के साथ वो शादीशुदा हो गई। अगले दिन उनकी विदाई हुई और दो दिन बाद वो घर लौट आई प
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प्रेषक : जय उसने धीरे से उसके फ़ूल जैसे गुलाबी होंठ मेरे होंठों पर रख दिये। मुझे पता ही नहीं चला कि यह सब कैसे हो गया, हम दोनों एक दूसरे में खोते जा
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जानू जाओ न प्लीज ! अलग सा चेहरा बनाकर बोली। मुझे उसका चेहरा देखकर हँसी आ गई, मैं बोला- रोओ मत ! जा रहा हूँ ! मैं कहाँ रो रही हूँ? ठीक है, चलो चलते है
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प्रेषक : जय मैं अन्तर्वासना को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उसने हम सभी लोगों के साथ जोड़ा। अब मैं अपनी कहानी बताता हूँ इसलिये अपने अपने हथियार थाम कर
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आपने मेरी कहानी का पहला भाग वक़्त से पहले और किस्मत से ज्यादा पढ़ा होगा। वो रात कैसे गुजर गई पता ही नहीं चला। कॉलेज के बाद पहली बार पूरी रात जागते
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दोस्तो, मैं अर्पित एक बार फिर से आप के पास अपनी जिंदगी के कुछ यादगार लम्हे बांटने आया हूँ… आप सबने मेरी पिछली कहानियों में मेरे पहले प्यार के बारे मे
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लेखक : जीत शर्मा वो अचानक बेड से उठा और कमरे से बाहर जाने लगा। मैंने सोचा शायद मज़ाक कर रहा है। अभी वापस आकर मुझे अपने आगोश में ले लेगा। मैं इसी तर
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प्रेषक : सुनील कश्यप मुझे महसूस हुआ कि वह अब झड़ने वाली है। अब वह बोलने लगी- सुनील, मैं झड़ रही हूँ, हे भगवान् ! आह.. आआ… उम्म….ह्ह… सुनील मैं झड़ने वाल
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प्रेषक : सुनील कश्यप मैं कुछ देर तक उसके होंठों को चूमता रहा और चूचियों को दबाता रहा और वह बस ऊम्म्म…. उफ्फ…उम्म की आवाजें निकालती रही। फिर मैंने उस
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दोस्तो, मेरा नाम सुनील कश्यप है, मैं मुंबई में रहता हूँ। जिन लोगो ने मेरी कहानियाँ पढ़ी होगी उन्हें मेरे बारे में जानकारी होगी। मुझे आप लोगों के ढेर स
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प्रेषक : गौरव कुमार दोस्तो, आप सबको प्यार भरा नमस्कार ! मैं अन्तर्वासना का नियमित पाठक हूँ तो सोचा कि आज मैं भी अपने बारे में लिखूं। मेरा नाम गौरव
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सबसे पहले मैं अन्तर्वासना का धन्यवाद करूँगा जहाँ मेरी कहानी सम्भोग प्रबन्धन प्रकाशित हुई। मैं पाठकों का धन्यवाद करना चाहूँगा, जिनके मुझे काफी प्यार
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प्रेषिका : सुरभि तिवारी सुनील आ गया। मैंने उन दोनों का परिचय करवाया। खाना बना हुआ था, हमने साथ बैठ कर खाना खाया। बात करते हुए मैंने सुनील से कहा- स
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प्रेषक : नवजोत सिंह दोस्तो, मैं भी अन्तर्वासना के लाखों चाहने वालों में से एक हूँ। मैंने यहाँ सारी कहानियाँ पढ़ी हैं, हर कहानी को पढ़ने के बाद में अपन
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फ़ुलवा हरजीत सिंह ज्यों ही कमरे में दाखिल हुआ, सन्तो पलंग पर से उठी। अपनी तेज-तर्रार आँखों से उसकी तरफ घूरकर देखा और दरवाजे की कुण्डी बन्द कर दी। रात
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प्रेषिका : निशा कुणाल दो मिनट तक ऐसे ही यामिनी के होंटो को चाटता और चूसता रहा… जब दोनों की सांसें फूलने लगी तो कुणाल ने यामिनी के गुलाबी लबों से अप
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प्रेषिका : निशा “डार्लिंग ! आज तो बहुत सेक्सी दिख रही हो ! किस पर कयामत गिराने का इरादा है?” गिरीश ने अपनी पत्नी को देखकर हंसते हुए कहा जिसे वो अपने
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फ़ुलवा “और बता क्या हाल है?” “अपना तो कमरा है, हाल कहाँ है?” “ये मसखरी की आदत नहीं छोड़ सकती क्या?” “क्या करूँ? आदत है, बुढ़ापे में क्या छोड़ूं? स
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प्रेषक : विजय पण्डित “यह तो गार्डन है… किसी ने देख लिया तो बड़ी बदनामी होगी…” “तो फिर…?” “मौका तलाशते हैं… किसी होटल में चलें…?” “अरे हाँ… मेरी सह
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प्रेषक : विजय पण्डित सिनेमा हॉल में महक का हाथ मेरे हाथ के ऊपर आ गया। मुझे एक झटका सा लगा। मैंने धीरे से महक की तरफ़ देखा। उसकी बड़ी बड़ी आँखें मेरी तर
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(एक रहस्य प्रेम-कथा) मैं उसे चूमता हुआ नीचे मदनमंदिर की ओर आने लगा। पहले उसके सपाट पेट को उसके पश्चात उसकी नाभि और श्रोणी प्रदेश को चूमता चला गया। उस
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(एक रहस्य प्रेम-कथा) मंदिर आ गया था। बाहर लम्बा चौड़ा प्रांगण सा बना था। थोड़ी दूर एक काले रंग के पत्थर की आदमकद मूर्ति बनी थी। हाथ में खांडा पकड़े हुए
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(एक रहस्य प्रेम-कथा) आज हमारा खजुराहो के मंदिर देखने का प्रोग्राम था। रात के घमासान के बाद सुबह उठने में देर तो होनी ही थी। सत्यजीत का जब फ़ोन आया तब
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प्रेषक : अन्नू निशा मेरी एक मात्र लंगोटिया दोस्त है। एक दिन की बात है, जब मैं निशा के बुलाने पर उसके घर गया तो उसके घर वाले कहीं बाहर गए हुए थे। घर
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(एक रहस्य प्रेम-कथा) लिफ्ट से नीचे आते मैं सोच रहा था कि ये औरतें भी कितनी जल्दी आपस में खुल कर एक दूसरे से अपने अंतरंग क्षणों की सारी बातें बता देती
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(एक रहस्य प्रेम-कथा) मेरे प्रिय पाठको और पाठिकाओ, मेरी यह कहानी मेरी एक ई-मित्र सलोनी जैन को समर्पित है जिनके आग्रह पर मैंने अपने इस अनूठे अनुभव को क
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नमस्कार दोस्तो, सबसे पहले आप सबका धन्यवाद करता हूँ कि आप सभी को मेरी पिछली कहानियाँ काफी पसंद आई और आपके सुझावों और सराहना के लिये शुक्रिया। मेरी प
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प्रेषक : रॉकी कुमार मैं नौकरी की तलाश में हैदराबाद गया हुआ था, वहाँ मैं एक बॉयज़ हॉस्टल में रुका था अपने कुछ दोस्तों के साथ। जहाँ यह हॉस्टल था वो जग
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प्रेषक : जो हण्टर यदि घर में एक अदद भाभी हो तो मन लगा रहता है। उसकी अदायें, उसके द्विअर्थी डॉयलोग बोलना, कभी कभी ब्लाऊज या गाऊन में से अपने सुडौल मम
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लेखक : लीलाधर उसने कहा- लगातार चुभन से कभी कभी सिहरन होती है इसलिए उसे उसके हाथों को कुर्सी के हत्थों से बांधना होगा। शालू तब तक शर्म पर काबू पा चु
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